मेरी पुरानी अटेेेची।
- Wassup Bhopal

- Jul 29, 2018
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Updated: Aug 8, 2019
By: Mohit Saxena
अटेची की आवाज़ जो चु चु करके खुलती है, मेरे अश्क़ों से भीगी यादें भी उसमे टटोलने से मिल जाती हैं।
ये वही अटेची है, जिसको घर की देहलीज़ को छोड़ते वक़्त अपने हाथ में थामे निकला था, पापा की नसीयत, माँ की दुआएं, भाई का प्यार भरा अलविदा, सब इसमें साथ लेकर आया था, साथ ही साथ, मेरे दोस्तों की गन्दी आदतें, जैसे की सिगरेट और ताश की गदडी, और मेरे घर की गली के कोने वाली लड़की के वो खत, जिसमे “मत जाओ न” के अलावा कुछ न था। सबको एक छोटा सा सुटकेस मेने भी दिया था, जिसमे मेरा प्यार, और चिंता थी। वालिद साहब, हमेशा से खड़ूस थे, उस वक़्त भी थे, नसीहत के साथ था कि भविष्य बनाकर ही आना, उजाड़कर नहीं। मानो डरा रहे हों की मैं तभी मिलूंगा जब तू मिलने लायक हो जायेगा।
सालों पहले का ये किस्सा महज़ किस्सा ही रह गया था, माँ और अब्बा की मौत हादसा ही था, ऐसा लोगों का कहना था, पर सच था कि उनका खून हुआ था, अभी सात महीने पहले ही अब्बा का टेलीफोन आया था, की छत कच्ची होती जा रही है, कुछ पैसे भेज दे की मर्रम्मत हो जाये, मैंने हँसी में ताल दिया की “अरे बारिश में नाटक होते हैं उसके, कुछ नही होगा, फ़ालतू का पैसा लगाने से कोई मतलब नहीं।” और इस बोलकर मैंने फ़ोन रख दिया था, और लोगो को लगता है कि वो सिर्फ हादसा था। मैं उनको देखने भी नही गया, की किस तरह मैं उनके बिना आत्मा के शरीर को छू पाउँगा, किस तरह उनकी बंद आँखों से आँखें मिला पाउँगा, और हिम्मत न हुई। आज तीस जून है, अटेची में एक फोटो मिला, माँ पा और मेरा, तारीख थी तीस जून, लिखा था, हैप्पी मेर्रिज एनिवर्सरी टू माँ और पा।
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